Sleeping tablet uses in Hindi | स्लीपिंग टैबलेट की पूर्ण जानकारी व पूरा विवरण
एक बहुत आम किस्सा है। छह महीने पहले एक दोस्त को नींद न आने की परेशानी थी। डॉक्टर ने Zolpidem दी। तीन दिन में नींद आने लगी। एक महीने तक खाई। अब छोड़ने की कोशिश कर रहा है। नींद बिल्कुल नहीं आती। पहले दो घंटे करवटें बदलने के बाद नींद आती थी, अब आधी रात तक बिस्तर पर पड़े रहना पड़ता है।
यही है Rebound Insomnia। गोली बंद करते ही पहले से तीन गुना बुरी नींद की तकलीफ। अब बिना गोली के जीना मुश्किल हो गया।
नींद की गोलियों के बारे में कोई यह नहीं बताता कि "यह खतरनाक है।" बस इतना कहते हैं कि "नींद न आए तो गोली है।" यह लेख उसी कहानी का दूसरा पहलू बताएगा।
नींद की गोलियां दिमाग में क्या करती हैं?
दिमाग में GABA नाम का एक न्यूरोट्रांसमीटर होता है, जिसका पूरा नाम है Gamma-Aminobutyric Acid। यह दिमाग को शांत करता है। नर्व सेल्स को ज़्यादा उत्तेजित होने से रोकता है।
ज़्यादातर नींद की गोलियां GABA Receptors को उत्तेजित करती हैं। इससे GABA ज़्यादा काम करने लगता है, दिमाग सुस्त हो जाता है और नींद आ जाती है।
लेकिन यह दिमाग को कृत्रिम तरीके से सुस्त करना है, यह नींद प्राकृतिक नहीं है। इसमें गहरी REM नींद सही से नहीं आती और दिमाग पूरी तरह आराम नहीं कर पाता।
नींद की गोलियों के प्रकार
Benzodiazepines — पुरानी पीढ़ी
Alprazolam, Diazepam, Clonazepam इस वर्ग में आती हैं। ये 1960 और 70 के दशक में बनी दवाएं हैं। ये GABA-A Receptors को उत्तेजित करके दिमाग को सुस्त करती हैं। घबराहट में भी काम करती हैं, नींद में भी।
इनकी Half-life बहुत ज़्यादा होती है यानी शरीर में बहुत देर तक रहती हैं। Diazepam तो 20 से 100 घंटे तक शरीर में रह सकती है। अगले दिन सुबह उठने पर भी सुस्ती बनी रहती है। इनकी लत भी बहुत जल्दी लगती है।
Z-Drugs — नई पीढ़ी
Zolpidem और Zopiclone इस वर्ग में आती हैं। ये 1990 के दशक में आईं। कहा गया था कि Benzodiazepines के मुकाबले इनकी लत कम लगती है, लेकिन सच यह है कि लत लगती ज़रूर है, बस थोड़ी धीरे।
Zolpidem उन लोगों के लिए है जिन्हें लेटने के बाद नींद ही नहीं आती यानी Sleep Onset Insomnia। 15 से 30 मिनट में काम शुरू कर देती है। Zopiclone उनके लिए है जो आधी रात को बार-बार जाग जाते हैं। यह नींद की संरचना यानी Sleep Architecture को ठीक करती है।
लेकिन Z-Drugs में एक अजीब साइड इफेक्ट होता है जिसे Sleepwalking कहते हैं। अधूरी नींद में बिना जाने उठकर चलना, बातें करना, यहां तक कि खाना खाना भी हो जाता है। और अगली सुबह कुछ याद नहीं रहता।
Melatonin — सबसे सुरक्षित विकल्प
Melatonin एक हार्मोन है जिसे रात होने पर Pineal Gland बनाता है। यह शरीर को संकेत देता है कि अब सोने का वक्त है। बाहर से Melatonin सप्लीमेंट लेने पर शरीर की Circadian Rhythm यानी जैविक घड़ी ठीक होती है। लंबी यात्राओं में Jet Lag को भी यह ठीक करती है।
यह दिमाग को सुस्त नहीं करती, GABA को नहीं छेड़ती, और इसकी लत नहीं लगती। इसलिए इसके साइड इफेक्ट बहुत कम हैं। लेकिन गंभीर नींद की समस्या में Melatonin अकेले काफी नहीं होती। यह वजह को ठीक करती है, जबरदस्ती नींद नहीं लाती।
Amitriptyline — जब डिप्रेशन नींद को बर्बाद करे
जिन लोगों को अवसाद होता है उनकी नींद खराब हो जाती है। Serotonin की कमी से नींद बिगड़ती है। Amitriptyline Serotonin बढ़ाती है, अवसाद कम होता है और नींद सुधरती है। यह दरअसल एक Anti-depressant दवा है जिसका साइड इफेक्ट नींद लाना है, यह सीधे नींद की गोली नहीं है।
Tolerance क्या है और यह खतरनाक क्यों है?
एक उदाहरण से समझें। जो लोग रोज़ काफी पीते हैं उन्हें एक कप से कैफीन का असर नहीं होता। दो कप चाहिए, फिर तीन। यही Tolerance है।
नींद की गोलियों के साथ भी ऐसा ही होता है। 5mg से नींद आती थी। दो हफ्ते में 5mg काफी नहीं। 10mg चाहिए। तीन हफ्ते में 10mg भी कम पड़ती है। खुराक बढ़ती जाती है। और जितनी ज़्यादा खुराक, उतना ज़्यादा लिवर पर बोझ, नसों को नुकसान और याददाश्त की कमज़ोरी।
Rebound Insomnia क्यों होती है?
दिमाग एक कमाल का अंग है। जब उसे पता चलता है कि बाहर से GABA आ रहा है, तो वो खुद GABA बनाना कम कर देता है, सोचता है कि क्यों मेहनत करें।
जब गोली बंद होती है तो बाहर से GABA आना रुक जाता है। शरीर का अपना GABA पहले से कम हो चुका होता है। दिमाग अचानक बहुत ज़्यादा सक्रिय हो जाता है। नींद बिल्कुल नहीं आती, बल्कि पहले से कहीं ज़्यादा बुरी हालत हो जाती है। इसी को Rebound Insomnia कहते हैं।
Sleep Apnea वालों के लिए जानलेवा खतरा
Sleep Apnea एक ऐसी स्थिति है जिसमें नींद के दौरान सांस रुक जाती है। गले की मांसपेशियां ढीली पड़कर सांस की नली बंद कर देती हैं। सांस रुकती है, दिमाग हरकत में आता है और इंसान जाग जाता है, फिर से सांस आती है।
ऐसे में नींद की गोली दी जाए तो? गले की मांसपेशियां और ज़्यादा ढीली हो जाती हैं, सांस की नली और ज़्यादा बंद होती है, और दिमाग इतना सुस्त हो जाता है कि जागता ही नहीं। नतीजा — सांस बंद हो जाती है।
बहुत से लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हें Sleep Apnea है। ऐसे लोगों के नींद की गोली खाने के बाद रात में ही मृत्यु के मामले दर्ज हुए हैं। इसलिए जिन्हें ज़ोर की खर्राटें आती हों, रात को सांस रुकती हो, या अचानक नींद से उठ जाते हों, वे नींद की गोली लेने से पहले Sleep Study ज़रूर कराएं।
शराब और नींद की गोली — बेहद खतरनाक जोड़ी
शराब भी CNS Depressant है और नींद की गोली भी। दोनों साथ लेने पर दिमाग का सांस नियंत्रण केंद्र काम करना बंद कर सकता है। सांस रुक सकती है।
बहुत कम मात्रा में भी यह मेल खतरनाक है। यह मत सोचिए कि "एक पेग ले लिया, गोली से क्या फर्क पड़ेगा।" जिन लोगों की खांसी की दवा में Codeine हो वे भी सावधान रहें। Opioids और Benzodiazepines का मेल सांस रोक सकता है।
कानून क्या कहता है?
भारत के दवा कानून में नींद की गोलियां Schedule X या H1 श्रेणी में आती हैं। डॉक्टर की पर्ची के बिना इन्हें बेचना या खरीदना गैरकानूनी है। मेडिकल स्टोर को पर्ची रखनी होती है और बिक्री का रिकॉर्ड रजिस्टर में दर्ज करना होता है।
व्यवहार में कुछ जगहों पर ये नियम नहीं माने जाते और बिना पर्ची के दवा मिल जाती है। लेकिन यह सरासर गैरकानूनी है और दुकानदार व खरीदार दोनों कानूनी मुसीबत में पड़ सकते हैं।
बिना गोली के भी नींद आ सकती है
CBT-I — मनोवैज्ञानिक इलाज
Cognitive Behavioral Therapy for Insomnia यानी CBT-I, नींद न आने की दुनिया की सबसे ज़्यादा सिफारिश की जाने वाली थेरेपी है। दवाओं से ज़्यादा टिकाऊ असर देती है।
यह नींद के बारे में गलत सोच को बदलती है। "नींद नहीं आई, कल काम बिगड़ेगा, पता नहीं क्या होगा" — यह घबराहट ही नींद को और दूर भगाती है। CBT-I इसी सोच को ठीक करती है। Sleep Restriction Therapy में बिस्तर पर रहने का वक्त सीमित किया जाता है। शुरू में मुश्किल लगता है, लेकिन धीरे-धीरे नींद गहरी और मज़बूत होती जाती है।
नींद की अच्छी आदतें
सोने से एक घंटे पहले मोबाइल, लैपटॉप और TV बंद कर दीजिए। Blue Light यानी नीली रोशनी Melatonin बनने से रोकती है। शाम 4 बजे के बाद चाय, कॉफी और एनर्जी ड्रिंक न पिएं। Caffeine 8 घंटे तक असर करती है। रात 11 बजे सोना हो तो दोपहर 3 बजे तक पी गई कॉफी भी तब तक काम कर रही होती है।
कमरे को हल्का ठंडा रखें। जब शरीर का तापमान थोड़ा कम होता है तो नींद आसानी से आती है। हर रोज़ एक ही वक्त पर उठें, चाहे वीकेंड हो। इससे Circadian Rhythm यानी जैविक घड़ी ठीक रहती है।
प्राकृतिक उपाय
Ashwagandha नसों को शांत करता है, Cortisol कम करता है और नींद सुधारता है। रात को सोने से पहले जायफल मिला गर्म दूध पीना एक पुराना तरीका है। जायफल यानी Nutmeg में Trimyristin नाम का एक तत्व GABA को थोड़ा उत्तेजित करता है।
Magnesium की कमी भी नींद न आने की वजह हो सकती है। Magnesium Glycinate सप्लीमेंट नींद को बेहतर बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या पूरी ज़िंदगी खा सकते हैं? बिल्कुल नहीं। अधिकतम 2 से 4 हफ्ते। उससे ज़्यादा लत लग जाती है। लंबे समय तक खाने पर नसों को नुकसान और याददाश्त कमज़ोर हो सकती है।
बिना पर्ची के ले सकते हैं? कानूनी तौर पर नहीं। और खुद से लेना खतरनाक भी है। बिना जांच के Sleep Apnea जैसी गंभीर बीमारी छुपी रह सकती है।
गोली छोड़नी हो तो कैसे? एकदम से मत छोड़िए। Rebound Insomnia के अलावा दौरे पड़ने का भी खतरा है। डॉक्टर की देखरेख में धीरे-धीरे खुराक कम करनी होती है।
अंत में एक ईमानदार बात
नींद की गोली एक बैसाखी है। जिसका पैर टूटा हो उसे ठीक होने तक बैसाखी चाहिए। लेकिन ठीक होने के बाद बैसाखी के बिना चलना सीखना पड़ता है।
नींद न आने पर गोली देना शुरुआत है, असली इलाज तो वजह ढूंढना और उसे दूर करना है। तनाव है? शरीर में दर्द है? कैफीन ज़्यादा हो रही है? स्क्रीन पर बहुत वक्त जा रहा है? Sleep Apnea तो नहीं?
जब वजह ठीक होगी तो बिना गोली के नींद खुद वापस आएगी। यही असली हल है।
References
https://medlineplus.gov/druginfo/meds/a693025.html
https://www.nccih.nih.gov/health/melatonin-what-you-need-to-know
https://www.nccih.nih.gov/health/sleep-disorders-and-complementary-health-approaches

